भारत-नेपाल सीमा पर सीतामढ़ी जिले के सुरसंड प्रखंड मुख्यालय में बनने वाली खास डिजाइन की पिड़किया के स्वाद के दीवाने जितने सरहद के अंदर और उतने ही सरहद के पार भी।
इस जगह से करीब पांच-छह किलोमीटर की दूरी पर भिट्ठामोड़ से नेपाल की सीमा अवस्थित है, जहां से होकर लोग नेपाल के जनकपुर धाम (राजा जनक की राजधानी और माता सीता की मायका ) है। यहां की पिड़ुकिया अपनी खास बनावट, सोंधी खुशबू और लंबे समय तक खराब न होने के गुण के कारण भारत-नेपाल में प्रसिद्ध है।
पुराने समय में जब लोग लंबी यात्रा पर निकलते थे, तो यहां की खोवा वाली पिड़ुकिया साथ ले जाते थे। धीरे-धीरे नेपाल और बिहार सहित देश के कई राज्यों में यह स्वाद ‘ब्रांड’ बन गया।
ब्रिटिश काल से ही संचालित दुकानदार सुरसंड नगर पंचायत वार्ड 16, निवासी स्वर्गीय रामचंद्र साह, अपने चार पुत्रों महेंद्र साह, योगेंद्र साह, भरत साह व शत्रुघ्न साह अन्य कर्मियों के साथ पिड़किया बनाते आ रहे थे। उनके निधन के बाद अब उनके चारों पुत्र इसे बनाते हैं। जैसे-जैसे समय बदलता गया वैसे-वैसे कई दुकानें खुल गई।
सुरसंड में भरत साह तो भिट्ठामोड़ महेंद्र साह इसे संचालित करने लगे। शुरुआत में एक पिड़किया की कीमत चार पैसे थे। बाद में 10 पैसे। फिर एक-दो रुपये से होते-होते आज 35 से लेकर 40 रुपये तक में एक पिड़किया बिक रही है। आम दिनों में यहां औसतन एक दुकान से 500 से 1,000 पिड़किया की बिक्री हो जाती है।
खास अवसरों जैसे शादी-ब्याह और त्योहारों के समय यह संख्या 5,000 से 10,000 प्रतिदिन तक पहुंच जाती है। लोग यहां से थोक भाव में पिड़किया पैक कराकर बाहर रहने वाले रिश्तेदारों को भेजते हैं।
यहां की एक पिड़किया में खोवा 40 ग्राम, काजू, किशमिश और इलायची डाली जाती है। फिर इसे चाशनी में डूबाया जाता है। इस कारण मुंह में जाते ही यह घुल जाती है।
महिलाओं का नजरिया और रिवाज
घर की बुजुर्ग महिला माला ठाकुर, राजपति देवी, चंद्रकला देवी, आदिती देवी, गिरिजा देवी कहती हैं-‘हम तो जब से ब्याह कर आए हैं, मां और सास को देख-देखकर सीख गए। वैसे हमलोग बिना चीनी-मीठा की चाशनी के बनाते हैं। इस कारण यह सूखी और थोड़ी सख्त होती है। साथ ही उसकी साइज भी छोटी होती है।
जबकि, सुरसंड की दुकान में बनने वाली पिड़किया नरम, मीठी और बड़े आकार के होने के कारण मिठाई के शौकीनों की यह पहली पसंद बन जाती है। हमारे यहां बिना पिड़किया के कोई तीज-त्योहार पूरा नहीं होता।
मिथिलांचल और सुरसंड में तीज और जितिया, होली, दुर्गापूजा, दीपावली, छठ पर्व, नववर्ष के त्योहार पर पिड़किया बनाया जाता है। यह बेटियों के यहां ‘सनेस’ (संदेश) के रूप में भी भेजा जाता है। यह प्यार और मिठास का प्रतीक है।

