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The Voice Of Bihar > Blog > कहानी > एक बच्ची को लगी चोट और चली गई सरकार की कुर्सी! जानें नेपाल में ‘तख्तापलट’ की कैसे हुई शुरुआत?
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एक बच्ची को लगी चोट और चली गई सरकार की कुर्सी! जानें नेपाल में ‘तख्तापलट’ की कैसे हुई शुरुआत?

Saroj Raja
Last updated: 2025/09/11 at 6:58 AM
Saroj Raja
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6 Min Read
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नेपाल में इन दिनों हालात काफी गंभीर हैं. सड़कों पर युवाओं के प्रदर्शन ने सरकार गिरा दी. हालांकि इस प्रदर्शन से पहले एक ऐसी घटना हुई थी, जिसने वहां के लोगों को बहुत नाराज कर दिया. दरअसल एक मंत्री की गाड़ी ने एक छोटी बच्ची को टक्कर मार दी और उसे वहीं छोड़कर भाग गई. इस घटना ने लोगों के गुस्से को और भड़का दिया. यह सिर्फ एक हादसा नहीं था, बल्कि यह उस गुस्से का नतीजा था जो कई सालों से लोगों के मन में दबा हुआ था. लोग पहले से ही बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से परेशान थे और इस घटना ने आग में घी डालने का काम किया. 

एक हादसा, जो बन गया बड़ा मुद्दा
नेपाल में 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन के बाद 6 सितंबर की सुबह करीब 7:15 बजे एक मंत्री राम बहादुर मगर की जीप ने 11 साल की उषा मगर सुनुवार को टक्कर मार दी. बच्ची स्कूल के बाहर थी, जब यह हादसा हुआ. सीसीटीवी कैमरे में साफ दिखा कि गाड़ी बच्ची को टक्कर मारकर बिना रुके चली गई. गनीमत रही कि बच्ची को सिर्फ चोटें आईं, लेकिन यह तस्वीर सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गई. 

सरकार की बेपरवाही
इस घटना के बाद प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इसे एक साधारण हादसा कह दिया और बस इलाज का खर्चा उठाने का वादा किया. उनकी इस बात ने लोगों को और भी गुस्सा दिला दिया. लोगों को लगा कि सरकार को उनकी बिल्कुल भी परवाह नहीं है. पोखरा यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर योग राज लामिछाने ने कहा, “उस समय में प्रकट हुई उदासीनता ने जो थोड़ा-बहुत भरोसा बचा था, उसे भी खत्म कर दिया. अगर किसी मंत्री की गाड़ी किसी स्कूली छात्रा को टक्कर मार सकती है और प्रधानमंत्री इसे सामान्य बता रहे हैं, तो इससे बाकियों को क्या संदेश जाएगा?” वहीं त्रिभुवन यूनिवर्सिटी की एक छात्रा मीरा थापा ने कहा, “उन्होंने एक बच्ची के दर्द को यूं ही नजरअंदाज नहीं किया. उन्होंने हमें दिखाया कि हमारा कोई महत्व नहीं है. हम पहले से ही भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और बेरोजगारी को लेकर गुस्से में थे. यही चिंगारी थी.”

कई सालों का गुस्सा
यह गुस्सा सिर्फ इस एक हादसे की वजह से नहीं था. नेपाल में कई महीनों से लोगों में असंतोष बढ़ रहा था. युवा बेरोजगारी से परेशान हैं. वर्ल्ड बैंक के अनुसार, 2024 में 15 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी की दर 20.8% थी. नौकरी न होने की वजह से लाखों युवा हर साल विदेश, खासकर खाड़ी देशों में चले जाते हैं. जो लोग देश में रहते हैं, उन्हें बढ़ती महंगाई और रुके हुए विकास का सामना करना पड़ता है. देश की एक तिहाई से ज्यादा कमाई (33.1%) विदेश में रहने वाले नेपाली लोगों की कमाई से आती है.

भ्रष्टाचार और परिवारवाद का आरोप
लोगों का गुस्सा भ्रष्टाचार और परिवारवाद पर भी था. पूर्व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर सुशील प्याकुरेल ने कहा, “आप जहां भी देखें, वहां नेताओं के बेटे-बेटियां और भतीजे-भतीजियां ही सरकारी पदों पर बैठे हैं. आम आदमी के लिए कुछ नहीं बचता.” कई युवाओं को लगता है कि उनके लिए मौके ही खत्म हो गए हैं. एक युवा डिजाइनर सृजना लिंबू ने कहा, “मेरे दोस्त इसे ‘सॉफ्ट एग्जाइल’ कहते हैं. या तो देश छोड़ दो, या बिना इज्जत के यहां रहो. हम पढ़े-लिखे हैं, लेकिन हमें नजरअंदाज किया जाता है.”

सोशल मीडिया पर ‘नेपो किड्स’ का गुस्सा
विरोध का एक और कारण ‘नेपो किड्स’ यानी प्रभावशाली नेताओं के बच्चों का सोशल मीडिया पर अपनी लक्जरी लाइफस्टाइल दिखाना था .एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “ये ‘नेपो किड्स’ इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर अपना ठाठ-बाट दिखाते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि यह पैसा कहां से आता है.” विश्लेषकों का मानना है कि यह विरोध प्रदर्शन होना तय था. प्रोफेसर लामिछाने ने कहा, “सोशल मीडिया पर प्रतिबंध ने दशकों की शिकायतों को और हवा दी. युवा अब और इंतजार करने को तैयार नहीं हैं. वे अभी बदलाव चाहते हैं.” काठमांडू की सड़कों पर “ओली चोर, देश छोड़” के नारे लगने लगे, जो लोगों के गुस्से का प्रतीक बन गया. एक छात्र बिबेक अधिकारी ने कहा, “हमें लोकतंत्र की कहानियां सुनकर बड़ा किया गया, लेकिन हम मंत्रियों की राजशाही में रह रहे हैं. एक सरनेम हर दरवाजा खोल सकता है.” इस तरह एक छोटी-सी घटना ने नेपाल में बड़े विरोध की शुरुआत कर दी.

इस विरोध के बाद नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व विदेश मंत्री एनपी सऊद ने निराशा को स्वीकार किया. उन्होंने अपने बयान में कहा, “हां, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद असली मुद्दे हैं, लेकिन इनका समाधान कानूनी तरीकों और संविधान के जरिए होना चाहिए.” इस मुद्दे पर अब नेता कुछ भी कह रहे हों, लेकिन 35 वर्षीय रचना सपकोटा जैसे प्रदर्शनकारियों की सोच अलग है. उसने कहा, “कल जो हुआ उसे देखने के बाद मेरी इंसानियत ने मुझे घर पर रहने की इजाजत नहीं दी. हम उन लोगों के लिए न्याय चाहते हैं जो मारे गए.” यानी बाकी मुद्दों के अलावा प्रदर्शन में युवाओं की मौत के बाद मामला और भी बिगड़ गया. 

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